Saturday, June 8, 2019

एड्म स्मिथ बनाम जॉन मेनार्ड कींस।

क्या भारत को  मंदी और बेरोजगारी से उबारने के लिए एडम स्मिथ( laissez faire) की जगह जॉन मेनार्ड कींस( the general theory of employment interest and money) के सिद्धांतों पर जोर देने की ज़रूरत है? क्या मनरेगा जैसी योजनाएं कहीं ना कहीं कींस के आर्थिक सिद्धांतों का समर्थन करती हुई प्रतीत नहीं होती हैं!  क्रय शक्ति समता यानि (ppp)के आधार पर हम विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है अगर पीपीपी इतनी ही मजबूत है तो यह मंदी क्यों? पीपीपी में बढ़ोतरी हर प्रकार की मंदी से उबरने में लगभग सहायक होती है और कहीं ना कहीं हर क्षेत्र की  संवृद्धि दर को बढ़ाने में मददगार होती हैं। क्या हमें बड़ी -बड़ी वस्तुओं से निकलकर फिर से एफएमसीजी गुड्स की ओर झांकने की जरूरत है।  एमबीए गुरु फिलिप कोटलर  ने  अपनी मार्केटिंग की किताब में एफएमसीजी गुड्स पर बहुत जोर दिया है। उम्मीद है आने वाले समय में ब्याज दर और घटेगी, लोगों की तनख्वाह में बढ़ोतरी होगी और सरकार हर प्रकार से तरलता में वृद्धि करने का प्रयास करेगी; क्योंकि इन्हीं वजहों से कहीं ना कहीं आने वाले समय में आर्थिक संवृद्धि(economic growth )दर अपने मुकाम पर पहुंच सकेगी। यद्यपि हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य देशों के मुद्रा अवमूल्यन, व्यापार प्रतिबंधों ,क्षेत्रीय आर्थिक समझौतों तथा ट्रेड वार का भी ध्यान रखना पड़ेगा। डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपए को अस्त्र बनाकर हम निर्यात में बढ़ोतरी भी कर सकते हैं।
 आशुतोष एस मन्नू
Asst.Professor